प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं....मोहनदास कर्मचंद गांधी...........मुझे मित्रता की परिभाषा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने ऐसा मित्र पाया है जो मेरी ख़ामोशी को समझता है

Tuesday, December 13, 2011

सर्दी / दीनदयाल शर्मा






सर्दी आई सर्दी आई
ओढ़ें कम्बल और रजाई
ज्यों-ज्यों सर्दी बढ़ती जाए
कपड़ों की हम करें लदाई।

मिलजुल सारे आग तापते
रात-रात भर करें हथाई।
भाँति-भाँति के लड्डू खाकर
सर्दी पर हम करें चढ़ाई।

सूरज निकला धूप सुहाई
सर्दी की अब शामत आई।
फाल्गुन आया होली आई
सर्दी की हम करें विदाई।।

-दीनदयाल शर्मा

7 comments:

  1. सूरज निकला धूप सुहाई
    सर्दी की अब शामत आई।
    फाल्गुन आया होली आई
    सर्दी की हम करें विदाई।।

    sunder aur khilkhilate hue balgeet ke liye aapko hardik bhadhai
    sunder kavya rachna

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  2. आपकी कवितायें हर विषय पर उम्दा ही होती हैं...
    जाड़े पर लिखी गयी इस कविता में पूरा चित्र अंकित कर दिया है आपने... kamaal है आपकी कविताई का.

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  3. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!
    शुभकामनाओं सहित!

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  4. सर्दी का आना और जाना दोनों ही खुशहाल होता है ... लाजवाब रचना है ..

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  5. बहुत सुन्दर.
    आपने कविता के साथ बाल-मंदिर ब्लाग से मेरी बिटिया सृष्टि का चित्र भी दिया, आभारी हूँ.
    हाँ, उसके नाम का भी उल्लेख्य करते तो और अधिक अच्छा लगता .

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  6. प्रिय नागेश जी, मुझे पता नहीं था कि ये फोटो आपकी बिटिया की है. नही तो मैं उसका नाम भी देता..मैंने ये फोटो नेट से सर्च करके इसमें लगाई है..बीटिया का नाम आप बता देते तो और भी अच्छा लगता..आपकी उदारता के लिए धन्यवाद..और नए साल पर हार्दिक बधाई....

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