प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं....मोहनदास कर्मचंद गांधी...........मुझे मित्रता की परिभाषा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने ऐसा मित्र पाया है जो मेरी ख़ामोशी को समझता है

Friday, October 17, 2014

दीपों का त्यौहार / दीनदयाल शर्मा


दीपों का त्यौहार / दीनदयाल शर्मा

दीपों का त्यौहार दिवाली
आओ दीप जलाएँ,
भीतर के अंधियारे को हम
मिलकर दूर भगाएँ।

छत्त पर लटक रहे हों जाले
इनको दूर हटाएँ,
रंग-रोगन से सारे घर को
सुन्दर सा चमकाएँ।

अनार, पटाखे, बम-फुलझडी,
चकरी खूब चलाएँ,
हलवा-पूड़ी, भजिया-मठी
कूद-कूद कर खाएँ।

सुन्दर-सुन्दर पहन के कपड़े
घर-घर मिलने जाएँ,
इक दूजे में खुशियाँ बाँटे,
अपने सब बन जाएँ।

Saturday, October 11, 2014

गुड़िया / दीनदयाल शर्मा

अन्तर्राष्ट्रीय बालिका दिवस पर मेरी एक कविता -
बालिकाओं को समर्पित ..

गुड़िया / दीनदयाल शर्मा
गुड़िया रोती ऊूँ - ऊूँ- ऊूँ
ना जाने रोती है क्यूँ
किसने इसको मारा है
या इसको फटकारा है
रोना अच्छी बात नहीं
फिर गुड़िया रोती है क्यूँ.
गुड़िया इसकी रूठ गई
या गुड़िया फिर टूट गई
टूटी को हम जोड़ेंगे
रूठी है तो रूठी क्यूँ..
गुड़िया को मनाएंगे
बार बार बहलाएंगे
कारण पूछें रोने का
गुड़िया तूं रोती है क्यूँ..
- दीनदयाल शर्मा, बाल साहित्यकार

Wednesday, September 17, 2014

फुलवारी/ दीनदयाल शर्मा











बाल कविता -

फुलवारी/ दीनदयाल शर्मा

भांत-भंतीली खुशबू प्यारी
महकी फूलों की फुलवारी

तितली फूलों पर मंडराए
भौंरे अपनी राग सुनाए
पत्ता-पत्ता हुआ हरा है
धरा हो गई हरियल सारी।

सूरज के उगते ही देखो
चिडिय़ा चहके गीत सुनाए
ओस की बूूंदों से टकराकर
कण-कण को रश्मि चमकाए

मदमाती जब चली पवन तो
महक उठी है क्यारी-क्यारी।

गेंदा और गुलाब - चमेली
सबकी खुशबू है अलबेली
जिधर भी देखो मस्ती छाई
जीव-जगत के मन को भायी

अपनी मस्ती में हैं सारे
भोली शक्लें प्यारी-प्यारी।।

Tuesday, August 19, 2014

घर म्हारो / दीनदयाल शर्मा

टाबरां री राजस्थानी कविता-

सैं'सूं न्यारो घर म्हारो / दीनदयाल शर्मा

सैं'सूं चोखो सैं'सूं न्यारो
घर म्हारो है सैं'सूं प्यारो
ईंट-ईंट मीणत सूं जोड़ी
जणां बण्यो घर प्यारो-प्यारो।
                                       
                                                                


अेक खुणै में झूलो बांध्यो
म्हे टाबरिया झूलो झूलां
टैम नेम सूं काम करां सै'
पढणो-लिखणो कदी नीं भूलां।

अेक खुणै में बणाई क्यारी
भांत-भंतीला लागरेया फूल
अेक खुणै में पूजा घर है
बणग्यो नित पूजा रौ उसूल।

रळमिल सिंझ्या खाणो खावां
सुख दु:खड़ै री सै' बात करां
माइतां सूं म्हे बंतळ सीखां
पुन रौ घडिय़ो रोजिनां भरां।

थे बी म्हारै घर आवो सा
रळमिल थारी मनवार करां
मिनखपणौ मिनखां सूं सीखां
मिनख बणन रौ म्हे जतन करां।।

Friday, August 8, 2014

दो शिशु गीत / दीनदयाल शर्मा



दो शिशु गीत / दीनदयाल शर्मा 




मेरा बस्ता 


मेरा बस्ता
भारी बस्ता
उठाऊं कैसे
हालत खस्ता..

आटा पाटा

आटा पाटा
कर तूं टाटा
रविवार को 

Sunday, July 27, 2014

यादें हरी हो जाती हैं....

मेरी हिंदी बाल नाटक कृति  "सपने"  के अंग्रेजी में अनुवाद "द ड्रीम्स"  का लोकार्पण 17 नवंबर 2005  को  तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब ने किया..जयपुर एयर पोर्ट पर आयोजित इस कार्यक्रम में तत्कालीन आई.जी. और मेरे साहित्यिक मित्र श्री आर. पी. सिंह (वरिष्ठ आई . पी. एस. ) साथ थे......कल की सी बात लग रही है........जब भी ये कृति या फोटो देखता हूँ तो यादें हरी हो जाती हैं.....इसके बाद इसी किताब "सपने" का 2012 में पंजाबी में "सुपणे" नाम से अनुवाद किया .....पंजाबी के जाने माने बाल साहित्यकार प्रिय भाई डॉ. दर्शन सिंह आशट ने.....जबकि हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद  किया था..श्री गंगानगर के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर श्री  पी. आर. गुप्ता ने.......अनुवादकों का हार्दिक आभार.. ... लोकार्पणकर्ता डॉ. कलाम साहब....इनके पी.ए. श्री एस. एम. खान साहब., बाल साहित्यकार शमशेर अहमद खान साहब.. और सभी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सहयोगिओं  का हार्दिक आभार..... अब मैं चाहता हूँ कि मेरी इस कृति का देश - विदेश की सभी भाषाओँ में अनुवाद हो..... ताकि इसे अधिक से अधिक पाठक वर्ग पढ़ कर लाभान्वित हो सकें.. जल्दी ही मैं अपनी मायड़ भाषा राजस्थानी में इस पुस्तक का अनुवाद करके पुस्तक रूप में छपवाना चाहूँगा.....आप सभी की दुआएं चाहिए..... पुस्तक पर जिस बच्चे का फोटो हैं..वह मेरे श्रद्धेय भाई साहब सरीखे मित्र श्री गोकुल गोस्वामी और हमारी भाभी जी श्रीमती कल्पना गोस्वामी के सुपुत्र आकाश गोस्वामी का हैं..यह आज लगभग 30 - 32 वर्ष का हैं....यह 8 -9 वर्ष का था तब मैं बुक के लिए भाभी जी से फोटो मांग कर लाया था....भाभी जी कहने लगे..फोटो क्यों आप इसे ही ले जाओ... आकाश अभी इंजिनीयर पद पर अपनी सेवाएं दे रहा हैं....और सुन्दर सी बहु हाउस वाइफ ......



Saturday, July 5, 2014

दीनदयाल रा दूहा / करम सुधारै काज

दीनदयाल रा  दूहा-

करम सुधारै काज / दीनदयाल शर्मा

सुरसत बैठी सा’मणै, चितर दिखावै च्यार।
बेदां नै तूं बांचले, पाछै कलम पलार।। 1

बैठ्यौ क्यूं है बावळा, टैम लाखिणी टूम।
मे’नत कर तूं मोकळी, झूम बराबर झूम।। 2

घोचो मुंडै क्यूं घालै, करले कोई काम।
घोचो बणसी घेंसळौ, लूंठां लोग लगाम।। 3

खाली नां कर खोरसौ, करम सुधारै काज।
भायां में भारी पड़ै, रोज करैलौ राज।। 4

जीभ चटोरी जोरगी, लपरावै क्यूँ  लार।
रूखी खा ले रोटड़ी, जिंदड़ी रा दिन च्यार।। 5

बातां मत कर बावळा, समझ टैम रो सार।
घट-बध नीं होवै घड़ी, रै’वै अेक रफ्तार।। 6

मे’नत स्यूं  मालक  बणै, बधता जावै बोल।
गांव गु’वाड़ी गोरुवैं, ढम-ढम बाजै ढोल।। 7

मिनखजमारौ मोवणौ, हरख राख तूं हीय।
रूखी सूखी खायके , पालर पाणी पीय।। 8

काम अेक  नीं तूं करै , पड़सी कियां पार।
सुपणां लेवै सो’वणां, सांचौ बण सरदार।। 9

मनड़ा मीठा मो’वणां, बूंदी - लाडू बोल।
सगळा करै सरावनां, आखौ कै ’ अनमोल।। 10

Tuesday, July 1, 2014

काळ रा दूहा- 3 / दीनदयाल शर्मा

खेती सगळी खूटगी, घणौ बध्यौ है घास।
खेतीखड़ रै खोरसौ, खळियौ खड़्यौ उदास।।

- दीनदयाल शर्मा

काळ रा दूहा- 2 / दीनदयाल शर्मा

 मिणत करै औ’ मोकळी,
दाणा हुवै न दोय।
जिनगी आखी जूझतौ,
सुपणा नीं ल्यै सोय।।

-- दीनदयाल शर्मा

काळ रा दूहा / दीनदयाल शर्मा

खेत खळा खाली खड़्या, 
के काडै किरसाण....... 
टाबर टसकै टीकड़ां.. 
घर घर में घमसाण..

दीनदयाल शर्मा 

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