प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं....मोहनदास कर्मचंद गांधी...........मुझे मित्रता की परिभाषा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने ऐसा मित्र पाया है जो मेरी ख़ामोशी को समझता है

Monday, November 24, 2014

सफाई की सौगंध / दीनदयाल शर्मा

हिन्दी बाल गीत-

सफाई की सौगंध / दीनदयाल शर्मा

आओ हम सब करें सफाई
रलमिल सारे बहना भाई

तन की मन की आस पास की
इधर उधर की आम खास की
जगह जगह जो लग गए जाले
उनकी है अब शामत आई.

गर हम सारे रखें सफाई
कण कण की यदि करें धुलाई
फिर सारे नीरोग रहेंगे
बीमारी में लगे न पाई..

पहला सुख नीरोगी काया
विद्वानों ने बात बताई
नित्य कर्म से जोड़ेंगे नाता
सबने मिल सौगंध है खाई..

- दीनदयाल शर्मा, 
बाल साहित्यकार

Friday, November 21, 2014

21 November 2014.World TV day


एक पहेली  / दीनदयाल शर्मा 

फ़िल्में, गीत, ख़बर और नाटक
रोज़ हमें दिखलाता ।
सीसे का छोटा सा बक्सा,
बोलो क्या कहलाता ?


Wednesday, November 19, 2014

शिक्षा की ताकत / दीनदयाल शर्मा

हिंदी बाल कविता -

शिक्षा की ताकत / दीनदयाल शर्मा

टन टन टन जब बजे तो घंटी
भागे दौड़े जाएं स्कूल
दड़बड़ दड़बड़ सब भागें तो
उड़ती जाए गली की धूल

कंप्यूटर से करें पढ़ाई ,
नई - नई बातें बतलाई
बस्ता अब कुछ हुआ है हल्का ,
मन भारी था हो गया फुलका .

अब न कोई करे बहाना
रोजाना स्कूल को जाना ,
पढ़ लिख कुछ बनने की ठानी
शिक्षा की ताकत पहचानी..

बच्चे मन के सच्चे / दीनदयाल शर्मा

हिन्दी बाल कविता....

बच्चे मन के सच्चे  / दीनदयाल शर्मा 

खट खट खट खट कटती लकड़ी 
आठ पैर की होती मकड़ी..

थप थप थप थप देती थपकी 
घोड़ा खड़ा खड़ा ले झपकी..

चट पट चट पट चने चबाए,
बकरी में में कर मिमियाए 

टर टर टर टर मेंढक करता 
चूहा बिल्ली से है डरता..

खट खट खट खट बजते बूट 
बिन जूतों के फिरते ऊँट ..

खड़ खड़ खड़ खड़ होता शोर.
बादल देख के नाचा  मोर..

छट पट छट पट बरखा आए
कागज की सब नाव चलाए..

दड़ बड़ दड़ बड़ भागे बच्चे 
मन से निर्मल होते सच्चे ...

बाल दिवस / दीनदयाल शर्मा

हिन्दी बाल कविता....

बाल दिवस / दीनदयाल शर्मा 

मां स्वरूपरानी थी जिनकी 
पिता थे मोतीलाल 
इलाहाबाद में जन्मे थे जो 
नाम जवाहरलाल 

मुंशी मुबारक अली सुनाते 
इनको रोज कहानी, 
अठारह सौ सत्तावन ग़दर के 
किस्से इन्हें ज़ुबानी 

प्राथमिक शिक्षा घर में दिलाई 
फिर भेजा परदेश
शिक्षा पूरी कर लौटे वे 
फिर भारत स्वदेश 

अंग्रेजों के अत्याचार से 
व्यथित भारतवासी 
राजद्रोही आरोप में जवाहर 
बने जेल प्रवासी 

पंद्रह अगस्त सैंतालिस के दिन 
हुआ देश आज़ाद 
तोड़ गुलामी की जंजीरें 
फिर से हुआ आबाद.

बच्चों के प्यारे चाचा तुम 
याद सभी को आते. 
चौदह नवंबर के दिन उत्सव 
रलमिल सभी मनाते..

Tuesday, November 18, 2014

अपना घर / दीनदयाल शर्मा

हिंदी बाल कविता -


अपना घर / दीनदयाल शर्मा 



एक - एक ईंट जोड़कर हमने ,
बनाया अपना सुन्दर घर.

अपने घर में रहें सहज हम, 
दूजों के घर लगता डर.

बच्चे हों तो करते रौनक,
किलकारी से गूंजे घर. 

बिन बच्चों के मकां है केवल,
सूना जैसे हो खँडहर .

घर हो तो हम उड़ें आसमां
लग जाते हैं जैसे 'पर'

घर जैसा भी होता  घर है. 
जीवन उसमें करें बसर. 

आओ रलमिल बनायें सारे. 
इक दूजे का अपना घर..

Sunday, November 16, 2014

जसाना में प्रतिभा सम्मान समारोह


हनुमानगढ़ जिले के जिला परिषद सदस्य युवा नेता श्री राजेंद्र सिहाग एवं युवा साहित्यकार श्री सतीश गोल्याण व इनकी पूरी टीम ने गत दिनों जसाना गांव में प्रतिभा सम्मान का भव्य समारोह आयोजित करके मुझे सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया ....


समारोह में गांव के लगभग 4 हजार बच्चे, युवा, बुज़ुर्ग और महिलाओं ने देर रात तक शिरकत की.... मैं अपने गांव जसाना के प्रतिभा सम्मान समारोह के आयोजकों और सहयोगिओं सहित समस्त ग्रामवासियों का तहे दिल से आभार प्रकट करता हूँ......



Thursday, November 13, 2014

चल चल चल / दीनदयाल शर्मा

हिंदी बाल गीत -


चल चल चल / दीनदयाल शर्मा

चल चल चल भई चल चल चल,
रुक ना कभी तू चलता चल।

ठहरा जल गंदा हो जाता,
उससे तू भी शिक्षा लेले
चलना ही कहलाता जीवन,
कर्म किए जा चलता चल,
इक दिन तुझको मिलेगा फल।

अपनी गाड़ी चलती जाए,
चलती का गाड़ी है नाम।
खड़ी रहे तो बने खटारा,
चलेगी तो फिर मिलेंगे दाम।
काम आज का आज करो तुम,
नहीं कहो तुम कल- कल-कल।


समय कभी नहीं रुकता देखो
चलता रहता पल-पल-पल
कितने करोड़ों दाम भी दे दो,
वापस कभी न आता कल।
समय की कीमत जानी न जिसने,
समय भी लेता उसको छल।


चल चल चल भई चल चल चल,
रुक ना कभी तू चलता चल।

Tuesday, November 11, 2014

ता-ता थैया-ता-ता थैया / दीनदयाल शर्मा



ता-ता थैया-ता-ता थैया / दीनदयाल शर्मा


ता-ता थैया- ता-ता थैया
नदिया में चलती है नैया॥

ता-ता थैया- ता-ता थैया
जंगल में चरती है गैया॥

ता-ता थैया- ता-ता थैया
सड़कों पर चलता है पहिया॥

ता-ता थैया- ता-ता थैया
राखी का बंधन है भैया॥

ता-ता थैया- ता-ता थैया
पॉकेट मनी पांच रुपइया॥

ता-ता थैया- ता-ता थैया
गीत सुरीला गाए सुरैया॥

ता-ता थैया- ता-ता थैया
नहाती मिट्टी में गौरैया॥

ता-ता थैया- ता-ता थैया
हम जैसा न कोई गवैया॥

Monday, November 10, 2014

आलस छोड़ो/ दीनदयाल शर्मा



आलस छोड़ो/ दीनदयाल शर्मा

मुर्गा बोला- जागो भैया,
बिस्तर में क्यों पड़े हो तुम।
आलस को अब दूर भगाओ,
सोच रहे क्या  तुम गुमसुम।

आलस है हम सबका दुश्मन
नहीं काम करने देता।
जो भी होता पास हमारे,
उसको भी यह हर लेता।

बाड़े में भी बोली गैया
बिस्तर में क्यों पड़े हो तुम।
आलस को अब दूर भगाओ,
सोच रहे क्या  तुम गुमसुम।

चीं-चीं करती कहे चिरैया,
बिस्तर में क्यों पड़े हो तुम।
आलस को अब दूर भगाओ,
सोच रहे क्या  तुम गुमसुम।

गाड़ी का कहता है पहिया,
बिस्तर में क्यों पड़े हो तुम।
आलस को अब दूर भगाओ,
सोच रहे क्या  तुम गुमसुम।

आलस छोड़ो सबकी मानो
अरे!  अब तो उठ जाओ तुम।
आलस को अब दूर भगाओ,
सोच रहे क्या  तुम गुमसुम।

Friday, November 7, 2014

अखबार ' नेशनल दुनिया ' में बच्चों की दुनिया / दीनदयाल शर्मा



आज हमारे देश के सुप्रसिद्ध अखबार ' नेशनल दुनिया ' के ' बच्चों की दुनिया ' स्तम्भ में मेरी शिशु कविताएं प्रकाशित हुई हैं... आप सभी की दुआएं और शुभकामनायें हैं...


सुबह सुबह आज कई मित्रों के फ़ोन आये और कइयों ने फेसबुक पर कमेंट किया..सबसे पहला फोन भरतपुर से मित्र मोहनलाल गुप्ता जी का मिला....इनका बहुत बहुत धन्यवाद...


आप सभी मित्रों का हृदय से आभार..इसी तरह प्यार बनाये रखें...


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