प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं....मोहनदास कर्मचंद गांधी...........मुझे मित्रता की परिभाषा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने ऐसा मित्र पाया है जो मेरी ख़ामोशी को समझता है

Saturday, July 5, 2014

दीनदयाल रा दूहा / करम सुधारै काज

दीनदयाल रा  दूहा-

करम सुधारै काज / दीनदयाल शर्मा

सुरसत बैठी सा’मणै, चितर दिखावै च्यार।
बेदां नै तूं बांचले, पाछै कलम पलार।। 1

बैठ्यौ क्यूं है बावळा, टैम लाखिणी टूम।
मे’नत कर तूं मोकळी, झूम बराबर झूम।। 2

घोचो मुंडै क्यूं घालै, करले कोई काम।
घोचो बणसी घेंसळौ, लूंठां लोग लगाम।। 3

खाली नां कर खोरसौ, करम सुधारै काज।
भायां में भारी पड़ै, रोज करैलौ राज।। 4

जीभ चटोरी जोरगी, लपरावै क्यूँ  लार।
रूखी खा ले रोटड़ी, जिंदड़ी रा दिन च्यार।। 5

बातां मत कर बावळा, समझ टैम रो सार।
घट-बध नीं होवै घड़ी, रै’वै अेक रफ्तार।। 6

मे’नत स्यूं  मालक  बणै, बधता जावै बोल।
गांव गु’वाड़ी गोरुवैं, ढम-ढम बाजै ढोल।। 7

मिनखजमारौ मोवणौ, हरख राख तूं हीय।
रूखी सूखी खायके , पालर पाणी पीय।। 8

काम अेक  नीं तूं करै , पड़सी कियां पार।
सुपणां लेवै सो’वणां, सांचौ बण सरदार।। 9

मनड़ा मीठा मो’वणां, बूंदी - लाडू बोल।
सगळा करै सरावनां, आखौ कै ’ अनमोल।। 10

Tuesday, July 1, 2014

काळ रा दूहा- 3 / दीनदयाल शर्मा

खेती सगळी खूटगी, घणौ बध्यौ है घास।
खेतीखड़ रै खोरसौ, खळियौ खड़्यौ उदास।।

- दीनदयाल शर्मा

काळ रा दूहा- 2 / दीनदयाल शर्मा

 मिणत करै औ’ मोकळी,
दाणा हुवै न दोय।
जिनगी आखी जूझतौ,
सुपणा नीं ल्यै सोय।।

-- दीनदयाल शर्मा

काळ रा दूहा / दीनदयाल शर्मा

खेत खळा खाली खड़्या, 
के काडै किरसाण....... 
टाबर टसकै टीकड़ां.. 
घर घर में घमसाण..

दीनदयाल शर्मा 

Sunday, June 15, 2014

फादर्स डे पर विशेष
















फादर्स डे पर विशेष

पिताजी कहते थे
जल्दी उठो
वे खुद जल्दी उठते थे

वे कहते थे
मेहनत करो
वे खुद मेहनती थे

वे कहते थे
सच बोलो
वे खुद सच के हामी थे

वे कहते थे
ईमानदार रहो
वे खुद ईमानदार थे

मैं उनके बताए
क़दमों पर चला

आज सब कुछ है
मेरे पास .....
लेकिन पिताजी नहीं हैं..

दीनदयाल शर्मा
15 जून 2014 

Wednesday, April 23, 2014

विश्व पुस्तक दिवस पर मेरी एक कविता......





किताब




सुख - दुःख में साथ,

निभाती रही किताब

बुझे मन की बाती,
जलाती रही किताब

जब कभी लगी प्यास,
बुझाती रही किताब

मन जब हुआ उदास,
हँसाती रही किताब

अँधेरे में भी राह,
दिखाती रही किताब

अनगिनत खुशियाँ,
लुटाती रही किताब..

- दीनदयाल शर्मा

Monday, October 14, 2013

रावण

रावण

सालो-साल दशहरा आता
पुतला झट बन जाए।

बँधा हुआ रस्सी से रावण
खड़ा-खड़ा मुस्काए।

चाहे हो तो करे ख़ात्मा,
राम कहाँ से आए।

रूप राम का धरकर कोई,
अग्निबाण चलाए।

धू-धू करके राख हो गया,
नकली रावण हाय!

मिलकर खुशियाँ बाँटें सारे,
नाचें और नचाएँ।

अपने भीतर नहीं झाँकते,
खुद को राम कहाए।

सबके मन में बैठा रावण,
इसको कौन मिटाए।

- दीनदयाल शर्मा

Sunday, July 14, 2013

टाबरां री राजस्थानी तिमाही पत्रिका " पारस मणि "





टाबरां री राजस्थानी तिमाही पत्रिका " पारस मणि " प्रथम अंक



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Sunday, May 12, 2013

Book Review by Shri Paras Chand Jain, Tonk, Raj.

Reet ar Preet - Deendayal Sharma ri book ro 
Shivira May-June 2013 ank me Review 
by Shri Paras Chand Jain, DEO, Tonk, Rajasthan

Book Review



Reet ar Preet - Deendayal Sharma's book ka Review 
by Shri Naag Raj Sharma, Editor, Binjaaro, Pilani

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