सर्वोत्तम सूक्तियां

1. अनुशासन केवल फौजों के लिए ही नहीं मनुष्य जीवन के हर क्षेत्र के लिए है। - गांधी
2. घर वह नहीं है जहां आप रहते हैं, बल्कि वह होता है जहां लोग आपको समझते हैं।

मार्च 1989 राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से बाल कथा कृति "चिंटू-पिंटू की सूझ" पर दीनदयाल शर्मा को डॉ. शम्भूदयाल सक्सेना पुरस्कार प्रदान करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रभाकर माचवे।

श्री शर्मा को 1998 में राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की ओर से बाल नाटक कृति "शंखेसर रा सींग" पर जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार प्रदान करते हुए शिक्षामंत्री राजस्थान सरकार डॉ. बी.डी.कल्ला।

जुलाई 2003 को कोलकाता की साहित्यिक व सामाजिक संस्था मनीषिका की ओर से दीनदयाल शर्मा को सम्मानित करते हुए अतिथिगण।

सन् 2006 को राजस्थानी बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए श्री शर्मा को राष्ट्रीय संस्था बाल चेतना, जयपुर की ओर से सीतादेवी श्रीवास्तव स्मृति सम्मान प्रदान करते हुए दूरदर्शन के सहायक निदेशक डॉ. के.के. रत्तू, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. तारादत्त निर्विरोध व अन्य

26 दिसम्बर 2001 को देहरादून में हिंदी बाल कथा कृति 'पापा झूठ नहीं बोलते' पर दीनदयाल शर्मा को उत्कृष्ट बाल साहित्य पुरस्कार प्रदान करते केबिनेट मंत्री श्री लाखीराम जोशी ।

सन् 1998 में बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए दीनदयाल शर्मा को भारतीय बाल कल्याण संस्थान, कानपुर की ओर से सम्मानित करते हुए नंदन के संपादक श्री जयपकाश भारती । साथ हैं संस्था अध्यक्ष वरिष्ठ बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबंधु व अन्य।

चित्तौड़गढ़ में आयोजित समारोह में राजस्थानी बाल साहित्य कृति "म्हारा गुरुजी" के लिए दीनदयाल शर्मा को चंद्रसिंह बिरकाळी बाल साहित्य पुरस्कार प्रदान करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमानंद सरस्वती। साथ हैं देवपुत्र के संपादक श्री कृष्णकुमार अष्ठाना, इंदौर, बाल साहित्यकार राजकुमार जैन 'राजन', चित्तौड़गढ़ व अन्य। सन् 2001

अक्टूबर 1997 को भीलवाड़ा (राजस्थान) में आयोजित बाल साहित्यकार सम्मेलन में बाएं से डॉ. भगवतीलाल व्यास, उदयपुर, डॉ.रतनलाल शर्मा, नई दिल्ली व दीनदयाल शर्मा, हनुमानगढ़।


8 सितम्बर 2005 को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा को जयपुर के बिड़ला सभागार में सर्वाधिक पुस्तक दानदाता का राज्य स्तरीय पुरस्कार प्रदान करते हुए खेल मंत्री श्री युनूस खान ।

नई दिल्ली गाँधी शांति प्रतिष्ठान , गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा में चिपको आंदोलन के प्रणेता श्री सुंदरलाल बहुगुणा के साथ दीनदयाल शर्मा।

बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा, आधुनिक राजस्थानी के चितेरे कवि श्री चंद्रसिंह बिरकाळी के साथ।

दीनदयाल शर्मा की राजस्थानी बाल नाटक कृति "शंखेसर रा सींग" का 27 दिसम्बर 1997 को लोकार्पण करते हुए मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र। साथ में विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ बाल साहित्यकार हरदर्शन सहगल ।

बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए तत्कालीन जिला कलक्टर श्री सियाराम मीणा गणतंत्र दिवस पर सम्मानित करते हुए ।

5 सितम्बर 1988 को हनुमानगढ़ जिले की रावतसर तहसील के बालिका विद्यालय के आर्थिक सहयोग हेतु मास्टर फकीरचंद नाटक के लेखक एवं निर्देशक दीनदयाल शर्मा मुख्य भूमिका अभिनीत करते हुए।

2003 में महाकाली मंदिर, कोलकाता में बाल साहित्यकारों के साथ दीनदयाल शर्मा, धर्मपत्नी श्रीमती कमलेश शर्मा व बेटी मानसी शर्मा ।

स्वतंत्रता दिवस 1989 को बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए नगर परिषद हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित करते हुए मुख्य अतिथि ।

अंतर्राष्ट्रीय बाल वर्ष 1979 को हनुमानगढ़ जं. में आयोजित प्रथम बीकानेर मण्डल कब/बुलबुल उत्सव में मुख्य अतिथि जिलाधीश श्री गुमानसिंह को सैल्यूट देते हुए रोवर दीनदयाल शर्मा ।

गणतंत्र दिवस 1979 को फोर्ट स्कूल बीकानेर के परिसर में यू.आई.टी. चेयरमैन श्री मक्खन जोशी स्काउट पुरस्कार का प्रशस्ति पत्र प्रदान करते हुए ।

तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री बी.डी.कल्ला से पुरस्कार ग्रहण करते हुए ।

हंसना जरूरी है

1. रेलगाड़ी की खिड़की में एक यात्री की अंगुली आ गई तो वह चिल्ला उठा। तभी पास बैठे यात्री ने कहा- अरे तुम इतनी चोट में ही चिल्ला रहे हो, कल एक आदमी की गर्दन कट गई थी, उसने तो चूं तक नहीं की।
2. आज मेरा लड़का स्कूल नहीं आएगा (फोन पर प्रिंसिपल को कहा गया)। आप कौन बोल रहे हैं (प्रिंसिपल ने पूछा)। मेरे पापा । (उधर से उत्तर मिला)
3. एक मूर्ख दूसरे मूर्ख से पूछता है, भाई साहब चार बजे वाली रेलगाड़ी कब आएगी ? दूसरा मूर्ख- 3 बजकर 60 मिनट पर। पहला मूर्ख- अच्छा तो रेलगाड़ी का समय बदल चुका है !
4. एक बूढ़े व्यक्ति के सिर पर चार बाल निकल आए, मारे खुशी के वह नाई के पास गया। तो नाई ने पूछा- साहब इन बालों को काटूं या गिनूं ? तो वह व्यक्ति बोला- काले कर दो
5. ग्राहक- कीड़े मारने वाली दवा लौटाने आया हूं। दुकानदार- इसमें क्या खराबी है ? ग्राहक- इसमें कीड़े पड़ गए हैं।
6. एक नौकर ने अपने साहब से कहा- साहब एक आदमी आप से मिलना चाहता है। साहब ने पूछा- कौन है ? नौकर बोला- बड़ी-बड़ी मूंछों वाला है। साहब ने कहा- कह दो हमें नहीं चाहिए मूंछें।
7. एक मरीज ने डॉक्टर से पूछा- क्या आपने कभी कोई गलती नहीं की। डॉक्टर ने जवाब दिया- की क्यों नहीं। मैंने एक मरीज को केवल दो दिनों में ही ठीक कर दिया था। बाद में पता चला कि वह बहुत पैसे वाला था।
8. एक बच्चे ने अपनी कटिंग कराते समय नाई से पूछा- अंकल आपने कभी कुत्ते की कटिंग की है ? नाई- नहीं, आज पहली बार कर रहा हूं।
9. एक व्यक्ति अपना कुत्ता लेकर कसाई की दुकान पर पहुंचा और बोला- भाई साहब इस कुत्ते की पूंछ काट दो। कसाई ने पूछा- क्यों भाई साहब ? व्यक्ति बोला- यार, मेरी सासु मां कल हमारे यहां आ रही है, तो उन्हें किसी भी चीज से यह महसूस नहीं होना चाहिए कि कोई उनका स्वागत कर रहा है ।
10. एक भिखारी- बहनजी रोटी, सब्जी है क्या ? बहनजी- रोटी-सब्जी मांग रहा है, खाली रोटी से काम नहीं चलता क्या, आगे चल..... सब्जी नहीं बनी। भिखारी- बहनजी सब्जी बन जाए तो इतने नम्बर पर मिस कॉल जरूर कर देना ।

चिंटू पिंटू की सूझ

एक गांव में एक बिल्ली रहती थी। नाम था उसका झबरी। गांव के बच्चे प्यार से उसे झबरी मौसी कहते थे। झबरी मौसी के छोटे-छोटे प्यारे से दो जुड़वां बच्चे भी थे। एक का नाम था चिंटू और दूसरे का नाम था पिंटू। चिंटू और पिंटू सारा दिन उछल-कूद करते तो झबरी मौसी उन्हें खूब समझाती लेकिन उन पर अपनी मां की बातों का कोई असर नहीं होता। रात को सोने से पहले झबरी मौसी चिंटू और पिंटू को रोजाना एक नई कहानी सुनाती। कहीं जाकर वे अपनी मां की गोद में सोते। दिन बीतते गए। चिंटू और पिंटू भी बड़े होते गए। अब वे अपनी मां के साथ बाहर घूमने जाने लगे। एक दिन चिंटू ने अपनी मां से पूछा- मां हम दोनों भाई बाहर घूम आएं क्या ? झबरी मौसी बोली, ना बेटे अकेले बाहर मत जाना। वहां तुम्हें कोई आदमी पकड़कर अपने घर पर रख लेगा। चिंटू बोला, अच्छा मां, हम बाहर नहीं जाएंगे। कुछ देर बाद झबरी मौसी गांव में खाने की खोज में निकल पड़ी। तब चिंटू अपने भाई पिंटू से बोला, पिंटू भैया, अब अच्छा मौका है। मां तो बाहर गई हुई है। अपने भी कहीं से खाना ले आते हैं। पिंटू जाने को राजी हो गया। फिर दोनों भाई इधर-उधर देखते हुए एक साथ अपने घर से बाहर निकल पड़े। घूमते-घूमते वे दोनों भाई एक मकान के अन्दर घुसे तो देखा कि आंगन में एक रोटी पड़ी है। चिंटू ने झट से रोटी को उठाया और वे दोनों मकान से बाहर आ गए। बाहर आकर चिंटू ने रोटी के दो टुकड़े किए। उसने एक टुकड़ा अपने पास रख लिया और एक अपने भाई पिंटू को दे दिया। पिंटू बोला, चिंटू भैया, तूने रोटी का बड़ा टुकड़ा रखा है और मुझे छोटा टुकड़ा दिया है। चिंटू ने कहा, नहीं छोटे-बड़े नहीं हैं, दोनों टुकड़े बराबर हैं। पिंटू बोला, अच्छा दोनों टुकड़े बराबर हैं तो तुम अपने वाला टुकड़ा मुझे दे दो और मेरे हिस्से वाला तुम रख लो। चिंटू गुस्से से बोला, नहीं देता मैं। रोटी तो मैं ही उठाकर लाया था घर से। अब छोटा-बड़ा करके शोर क्यूं करता है ? चिंटू का गुस्सा देखकर पिंटू को भी गुस्सा आ गया। उसने अपने हिस्से की रोटी का टुकड़ा चिंटू की तफ फेंक दिया और चिंटू के हिस्से का टुकड़ा ज्योंही पिंटू ने छीनना चाहा तो चिंटू सतर्क हो गया। उसने पिंटू को जोर से चांटा लगा दिया। लड़ाई-झगड़े में पिंटू भी कम नहीं था। उसने भी चिंटू को जोर से झापड़ मारा। दोनों भाई अपस में गुत्थम-गुत्था हो गए। पास ही पेड़ पर एक बंदर बैठा दोनों भाइयों की लड़ाई देख रहा था। वह झट से पेड़ से नीचे उतरा और चिंटू-पिंटू से बोला, बच्चों.....आपस में क्यों झगड़ रहे हो ? चिंटू बोला, बंदर चाचा, झगड़ा तो पिंटू करता है। जब मैंने रोटी के बराबर-बराबर दो हिस्से कर इसे दिया तो यह छोटा-बड़ा कहकर मुझसे लड़ने लगा। बंदर बोला, ऐसा करो..... ये दोनों टुकड़े इधर लाओ मेरे पास। चिंटू ने झटपट जमीन पर पड़े रोटी के दोनों टुकड़ों को उठाया और बंदर को दिखाते हुए बोला, देखो बंदर चाचा, ये टुकड़े हैं दोनों। आपको इन दोनों में से कौन सा छोटा और कौन सा बड़ा लगता है ? बंदर अपने माथे पर हाथ रखता हुआ बोला, बच्चो, ऐसे कैसे पता चलेगा ? ये दोनों टुकड़े पहले मुझे दो। अगर ये छोटे-बड़े हुए तो मैं तुम दोनों को बराबर करके दे दूंगा। बंदर की बात सुनकर पिंटू चौंका और वह चिंटू से बोला, चिंटू भैया, रोटी के ये दोनों टुकड़े बंदर चाचा के हाथ में मत देना। नहीं तो अपने दोनों भाई भूखे ही रह जाएंगे। तूने मम्मी से वो दो बिल्लियों का झगड़ा और बंदर वाली कहानी नहीं सुनी थी क्या ? चिंटू भैया, दोनों टुकड़े बराबर ही हैं। मैं अब कभी नहीं झगड़ूंगा। अच्छा तो ये बात है। क्यूं बंदर चाचा, हम दोनों भाइयों को तुम ठगने की कोशिश कर रहे थे ना। अब वो जमाना लद गया चाचा। चिंटू ने इतना कहकर रोटी का एक टुकड़ा पिंटू के हाथ में थमा दिया और वे दोनों भाई अपने घर की तरफ चल दिए। बंदर अपना सा मुंह लेकर रह गया और छलांग लगाता हुआ वापस पेड़ पर चढ़ गया।

चिड़‍िया होता


पापा गर मैं चिड़‍िया होता

बिन पे‍ड़ी छत पर चढ जाता

मेरा बस्ता मुझसे भारी

उससे पीछा भी छुड़ जाता

होमवर्क ना करना पड़ता

जिससे मैं कितना थक जाता

धुआं, धूल और बस के धक्के

पापा फिर मैं कभी न खाता

कोई मुझको पकड़ न पाता

दूर कहीं पर मैं उड़ जाता।।

नानी

नानी तू है कैसी नानी
नहीं सुनाती नई कहानी
नानी बोली प्यारे नाती
नई कहानी मुझे न आती
मेरे पास तो एक कहानी
एक था राजा एक थी रानी
नई बातें कहां से लाऊं
तेरा मन कैसे बहलाऊं
तुम जानो कम्प्यूटर बानी
तुम हो ज्ञानी के भी ज्ञानी
मैं तो हूं बस तेरी नानी
तुम्हीं सुनाओ कोई कहानी।।
- दीनदयाल शर्मा

उल्टा पुल्टा

हो गया उल्टा-पुल्टा इक दिन
उड़ गया हाथी पंखों के बिन
धरती से पाताल की ओर
बीच चौराहे घनी भीड़ में
भरी दुपहरी नाचा मोर।।
बकरी ने दो दिए थे अण्डे
बैठे थे शमशान में पण्डे
गूंगी औरत करती शोर
चूहों की दहाड़ सुनी तो
सिर के बल पर भागे चोर।।
मुर्गा बोला म्याऊं-म्याऊं
बिल्ली बोली कुकड़ू-कूं
बिना पतंग के उड़ गई डोर
निकले तारे धरती पर तो
छिप गया सूरज हो गई भोर।।
-दीनदयाल शर्मा

वेबसाइट निर्माता

दुष्यंत जोशी, हनुमानगढ़ जंक्‍शन, राजस्थान

विशेष सहयोग

जाकिर अली रजनीश, http://baaludyan.blogspot.com/, http://alizakir.blogspot.com/