प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं....मोहनदास कर्मचंद गांधी...........मुझे मित्रता की परिभाषा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने ऐसा मित्र पाया है जो मेरी ख़ामोशी को समझता है

Monday, October 27, 2014

बबन विधाता / दीनदयाल शर्मा



बबन विधाता / दीनदयाल शर्मा 

बबन विधाता लेके छाता,
निकल पड़े बरसात में।
फिसले ऐसे गिरे जोर से,
कैसे चलते रात में।

कीचड़ में भर गए थे कपड़े,
देखे बबन विधाता।
इसी बीच में उड़ गया उनका,
रंग-बिरंगा छाता।

उड़ते-उड़ते छाता उनका,
पहुंच गया नेपाल।
बबन विधाता भीग गए सारे,
हो गए वे बेहाल।

चला हवा का झोंका उल्टा ,
वापस आ गया छाता।
तान के ऊपर चल दिए अपने,
घर को बबन विधाता।।

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (28-10-2014) को "माँ का आँचल प्यार भरा" (चर्चा मंच-1780) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    छठ पूजा की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. many many thanks ...Dr. Roopchandra Shastri Mayank ji....

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  2. बचपन-सी प्यारी और मासूम रचना !

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  3. धन्यवाद प्रीति जी...

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  4. बबन-विधाता----क्या नाम दिया!!!

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  5. बहुत प्यारी बाल कविता...

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  6. Ashish Awasthi ji aur Kailash Sharma ji...apka bahut bahut dhanyawaad...

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  7. बहुत ही सुन्दर
    मजा आ गया :-)
    सादर !

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  8. शिवनाथ कुमार जी और लेखिका ' Pari M Shlok' का बहुत बहुत आभार..जिन्हें मेरी बाल कविताएं बहुत पसंद आईं और इसके लिए उन्होंने कमेंट भी किया..

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