प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं....मोहनदास कर्मचंद गांधी...........मुझे मित्रता की परिभाषा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने ऐसा मित्र पाया है जो मेरी ख़ामोशी को समझता है

Thursday, April 23, 2015

विश्व पुस्तक दिवस पर विशेष

विश्व  पुस्तक दिवस पर विशेष -

किताब / दीनदयाल शर्मा 

सुख-दु:ख में साथ, 
निभाती रही किताब।

बुझे मन की बाती, 
जलाती रही किताब।

जब कभी लगी प्यास,
बुझाती रही किताब।

मन जब हुआ उदास,
हँसाती रही किताब।

अंधेरे में भी राह,
दिखाती रही किताब।

अनगिनत खुशियां,
लुटाती रही किताब॥












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