प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं....मोहनदास कर्मचंद गांधी...........मुझे मित्रता की परिभाषा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने ऐसा मित्र पाया है जो मेरी ख़ामोशी को समझता है

Sunday, July 18, 2010

दीनदयाल शर्मा की दो कविताएं


सपने और विश्वास

सपने तो लेते हैं हम सब, 
ऊंची रखते आस,
मिले सफलता उसको,
 जिसके मन में हो विश्वास।

बेमतलब की बात करें हम, 
अधकचरा है ज्ञान,
अपनी कमजोरी पर आख़िर , 
 क्यों नहीं देते ध्यान।
दोषी खुद हैं मंढें और पर, 
किसको आए रास।।

आगे बढ़ता देख न पाएं, 
भीतर उठती आग,
कहें चोर को चोरी कर तू, 
मालिक को कहें जाग।
कैसे हो कल्याण हमारा, 
चाहें और का नाश।।

अच्छा कभी न सोचेंगे हम, 
भाए न अच्छी बात
ऊंची-ऊंची फेंकने वालों, 
के हम रहते साथ।
लाखों की चाहत है अपनी, 
पाई नहीं है पास।।

आलस है हम सबका दुश्मन, 
इसको ना छोड़ेंगे
सरल मार्ग अपनाएं सारे, 
खुद को ना मोड़ेंगे।
अंधकूप में भटकेंगे तो, 
कैसे मिले उजास।।


समय नहीं कुछ कहने का

गलत काम में गुस्सा आता,
धीरज क्यों नहीं धरता मैं।
उम्मीदें पालूं  दूजों से, 
खुद करने से डरता मैं।।

आलस बहुत बुरी चीज है, 
किसको कैसे बतलाऊं।
आलस की नदिया में बैठा, 
अपनी गागर भरता मैं।।

समय की कीमत कब समझूंगा , 
समय निकल जाएगा तब।
समय सफलता कैसे देगा, 
कोशिशें ना करता मैं।।

सब कुछ जान लिया है मैंने, 
कुछ भी नहीं रहा बाकि।
मुझको कौन सिखा सकता है, 
अहंकार में मरता मैं।।

समय नहीं कुछ कहने का अब, 
खुद करलूं  तो अच्छा है।
सीख शरीर से उपजे सारी,
 बाहर क्यों विचरता मैं।।

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