प्रेम और सत्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं....मोहनदास कर्मचंद गांधी...........मुझे मित्रता की परिभाषा व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैंने ऐसा मित्र पाया है जो मेरी ख़ामोशी को समझता है

Friday, August 8, 2014

दो शिशु गीत / दीनदयाल शर्मा



दो शिशु गीत / दीनदयाल शर्मा 




मेरा बस्ता 


मेरा बस्ता
भारी बस्ता
उठाऊं कैसे
हालत खस्ता..

आटा पाटा

आटा पाटा
कर तूं टाटा
रविवार को 

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-08-2014) को "अत्यल्प है यह आयु" (चर्चा मंच 1700) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. मासूम सी कविता

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  3. पोस्ट किये गये चित्र ने मन मोह लिया.
    काशः आज बचपन का रूप ऐसा ही हो.

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