Tuesday, May 29, 2018
Saturday, May 12, 2018
Friday, May 11, 2018
Wednesday, April 4, 2018
Wednesday, January 31, 2018
Bal Sahityakar Deendayal Sharma Interview By Chand Mohammed Sheikh
28 जनवरी 2018 को प्रसारित हुआ "पत्रिका टीवी" पर मेरा इण्टरव्यु
https://youtu.be/aue2CvF7BQA पत्रिका टीवी पर "कलांजलि कार्यक्रम" में मेरा इण्टरव्यु....देखिए यूट्यूब पर.. पत्रिका टीवी परिवार और श्री चांद मोहम्मद शेख साहब का हार्दिक आभार....
Monday, December 25, 2017
रेडियो नाट्य कृति ’’जंग जारी है’’ का लोकार्पण
बेटियों की जंग गर्भ से ही शुरू हो जाती हैः ऋचा चौधरी
हनुमानगढ़। राजस्थान साहित्य परिषद् के तत्वावधान में बेबी हैप्पी माडर्न पीजी कॉलेज, हनुमानगढ़ में साहित्यकार दीनदयाल शर्मा की रेडियो नाट्यकृति ’’जंग जारी है’’ का लोकार्पण समारोह का आयोजन हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि एवं आर.जे.एस. ऋचा चौधरी (मजिस्ट्रेट), विशिष्ट अतिथि सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी सुरेश बिश्नोई, वरिष्ठ उद्घोषक राजेष चड्ढा, वरिष्ठ पत्रकार गोपाल झा, प्राचार्य डॉ. संतोष राजपुरोहित, केन्द्रीय साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत कवयित्री ऋतुप्रिया उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता बेबी हैप्पी मॉर्डन पीजी कॉलेज के डायरेक्टर तरुण विजय ने की। समारोह का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के समक्ष द्वीप प्रज्ज्वलित कर किया।समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि आर.जे.एस. ऋचा चौधरी (मजिस्ट्रेट) ने कहा कि समय की मांग के अनुसार बेटियों को केन्द्र में रखकर जो नाटक रचे गए हैं वे वास्तव में उल्लेखनीय है। उन्होंने कहा कि बेटियों को हमें हर क्षेत्र में आगे लाने का प्रयास करना चाहिए ताकि वे अपने देश का नाम रोषन कर सके। उन्होंने कहा कि बेटियों की जंग गर्भ से ही षुरू हो जाती है। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीआरओ सुरेष बिश्नोई ने कहा कि दीनदयाल षर्मा की रचनाओं का मैं शुरू से ही प्रषंसक रहा हूं। आपकी नाट्य कृति भी समाज हित के लिए सर्वोपरि होगी।
वरिष्ठ उद्घोषक राजेश चड्ढ़ा ने कहा कि नाट्य कला प्राचीनकाल से चली आ रही है। जिसकी परम्परा को कायम करने में दीनदयाल शर्मा का योगदान सराहनीय है। इस अवसर पर साहित्यकार दीनदयाल शर्मा ने नाटक की रचना प्रक्रिया के बारे में श्रोताओं को जानकारी दी और अपनी हास्य कविताओं से हंसाकर सबको लोट-पोट कर दिया।
संस्था के डायरेक्टर तरुण विजय ने अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए नाट्य कृति की प्रषंसा की। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन समय-समय पर होते रहने चाहिए। ताकि युवाओं को साहित्य के प्रति एक अच्छा मार्गदर्षन मिल सके। समारोह में युवा कवि दुष्यंत जोशी, संस्था के चेयरमेन आशिष विजय, प्रशासक परमानंद सैनी, उपप्राचार्य डॉ. मनोज शर्मा, छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष दुर्गाप्रताप शेखावत, बाल कथाकार मानसी शर्मा आदि उपस्थित थे।
इस अवसर पर राजस्थान साहित्य परिषद् की ओर से सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं नाट्य कृति ’’जंग जारी है’’ उपहार स्वरूप भेंट कर सम्मानित किया। प्रसारित रेडियो नाटक ’’पगली’’ प्रस्तुत किया गया। जिसे अतिथियों द्वारा खूब सराहा गया। कार्यक्रम का मंच संचालन राजस्थान साहित्य परिषद् के सचिव एवं व्याख्याता राजेन्द्र डाल ने किया।
Monday, October 23, 2017
बाल मनोविज्ञान के आइने में‘शंखेसर रा सींग’
बाल मनोविज्ञान के आइने में‘शंखेसर रा सींग’
बाल मानस का चतुर्मुखी विकास करना ही बाल साहित्य के सृजन का उद्देश्य है ताकि नई पीढ़ी को एक स्वर्णिम भविष्य दिया जा सके। बालक देश के भावी कर्णधार हैं। उनके लिए ऐसा साहित्य अपेक्षित है जो बालकों को सही अर्थों में इन्सान बनने के लिए प्रेरित करे। उनमें दया, क्षमा, त्याग, प्रेम एवं संवेदना आदि गुणों को उत्पन्न करे, उनके अंदर छिपी हुई प्रतिभा को विकसित कर पाये एवं उनमें आपसी वैमनस्य दूर करके परस्पर सद्भाव रखने का महामंत्र फूंके।
प्रस्तुत समीक्ष्य कृति ‘शंखेसर रा सींग’ श्री दीनदयाल शर्मा का सद्य प्रकाशित बाल नाटक है। इसमें घमण्ड जैसे विकार को लेखक ने अपने नाटक का विषय बनाया है। इस नाटक का कथ्य इस प्रकार है।
एक जंगल में पशु-पक्षी न्यायपूर्ण व्यवस्था के बीच अत्यन्त शांति और प्रेम के साथ परस्पर हिलमिल कर रहते हैं। कुछ समय पश्चात् वहां अन्य किसी स्थान से एक गदहा आकर रहने लगता है जो अत्यन्त दुष्ट प्रवृत्ति का है। उसके सिर पर (घमण्ड रूपी) दो नुकीले-तीखे सींग हैं जिनसे वह बिना वजह ही जंगल के अन्य जानवरों को डराता, धमकाता और घायल करता रहता है। परस्पर स्नेहपूर्वक रहने वाले शान्त स्वभाव के धैर्यवान् पशु काफी समय तक उसकी घमण्डी प्रवृत्ति और दुष्टता को सहन करते रहते हैं किन्तु जब दुखी हो जाते हैं तो वह अपने जंगल के राजा बघेलसिंह के पास जाकर उसकी शिकायत करते हैं। राजा बघेलसिंह शंखेसर को प्यार से समझाने का प्रयास करता है पर उसके अडिय़ल और घमण्डी रुख को देखकर अंतत: उसे उसके दोनों सींगों को उखड़वाकर उसे वहां से भगा देना पड़ता है।
इस छोटी सी कथा के माध्यम से कुशल लेखक ने बाल मनोविज्ञान का भरपूर प्रयोग करते हुए बालकों को स्वयं घमण्डी न बनने की शिक्षा दी है। दूसरे, आज हमारे समाज में ऐसे घमण्डी तत्वों की भरमार है जो आपसी सद्भाव और भाईचारे को अपने गर्व और अहंकार से हर समय चोट पहुंचाते रहते हैं, ऐसे तत्वों को प्रेम से समझाने-बुझाने पर यदि व्यवहार में बदलाव न आये तो उन्हें दण्ड दिया जाना आवश्यक है, किन्तु जान से मारना इसका समाधान नहीं है।
लेखक ने नाटक अत्यन्त सहज, सरल, रोजाना बोली जाने वाली राजस्थानी भाषा में लिखा है। नाटक इतना रोचक है कि बच्चे इस नाटक को मंच पर आसानी से खेल सकते हैं। बच्चे इसमें अभिनय करने, इसे देखने एवं पढऩे सभी में समान रूप से हर्षित होंगे। नाटक के सात दृश्य हैं। सातों में लेखक ने पात्रों के मनोभावों दर्शाने के लिए समयानुकूल उचित टिप्पणी (ब्रेकेट) में प्रदान की है ताकि अभिनय में आसानी रहे।
पुस्तक का आवरण विषय के मंतव्य को समझाने-दर्शाने में पूर्ण रूप से सक्षम है। पुस्तक का कागज, मुद्रण एवं साज-सज्जा सभी स्तरीय है। मैं इतने मनोरंजक बाल नाटक लिखने के लिए दीनदयाल शर्मा को हार्दिक बधाई देती हूं।
-सरला अग्रवाल,
आस्था, 5वीं 20 तलवण्डी,
कोटा-324005, राजस्थान
पुस्तक : शंखेसर रा सींग, लेखक : श्री दीनदयाल शर्मा, प्रकाशक : राजस्थान बाल कल्याण परिषद्, 10/22, आर.एच.बी., हनुमानगढ़ संगम (राज.), पृष्ठ : 40, मूल्य : 20 रुपये। बच्चों की प्रिय पत्रिका बालवाणी, अप्रैल, 1998, पेज संख्या-47 पर
बाल मानस का चतुर्मुखी विकास करना ही बाल साहित्य के सृजन का उद्देश्य है ताकि नई पीढ़ी को एक स्वर्णिम भविष्य दिया जा सके। बालक देश के भावी कर्णधार हैं। उनके लिए ऐसा साहित्य अपेक्षित है जो बालकों को सही अर्थों में इन्सान बनने के लिए प्रेरित करे। उनमें दया, क्षमा, त्याग, प्रेम एवं संवेदना आदि गुणों को उत्पन्न करे, उनके अंदर छिपी हुई प्रतिभा को विकसित कर पाये एवं उनमें आपसी वैमनस्य दूर करके परस्पर सद्भाव रखने का महामंत्र फूंके।
प्रस्तुत समीक्ष्य कृति ‘शंखेसर रा सींग’ श्री दीनदयाल शर्मा का सद्य प्रकाशित बाल नाटक है। इसमें घमण्ड जैसे विकार को लेखक ने अपने नाटक का विषय बनाया है। इस नाटक का कथ्य इस प्रकार है।
एक जंगल में पशु-पक्षी न्यायपूर्ण व्यवस्था के बीच अत्यन्त शांति और प्रेम के साथ परस्पर हिलमिल कर रहते हैं। कुछ समय पश्चात् वहां अन्य किसी स्थान से एक गदहा आकर रहने लगता है जो अत्यन्त दुष्ट प्रवृत्ति का है। उसके सिर पर (घमण्ड रूपी) दो नुकीले-तीखे सींग हैं जिनसे वह बिना वजह ही जंगल के अन्य जानवरों को डराता, धमकाता और घायल करता रहता है। परस्पर स्नेहपूर्वक रहने वाले शान्त स्वभाव के धैर्यवान् पशु काफी समय तक उसकी घमण्डी प्रवृत्ति और दुष्टता को सहन करते रहते हैं किन्तु जब दुखी हो जाते हैं तो वह अपने जंगल के राजा बघेलसिंह के पास जाकर उसकी शिकायत करते हैं। राजा बघेलसिंह शंखेसर को प्यार से समझाने का प्रयास करता है पर उसके अडिय़ल और घमण्डी रुख को देखकर अंतत: उसे उसके दोनों सींगों को उखड़वाकर उसे वहां से भगा देना पड़ता है।
इस छोटी सी कथा के माध्यम से कुशल लेखक ने बाल मनोविज्ञान का भरपूर प्रयोग करते हुए बालकों को स्वयं घमण्डी न बनने की शिक्षा दी है। दूसरे, आज हमारे समाज में ऐसे घमण्डी तत्वों की भरमार है जो आपसी सद्भाव और भाईचारे को अपने गर्व और अहंकार से हर समय चोट पहुंचाते रहते हैं, ऐसे तत्वों को प्रेम से समझाने-बुझाने पर यदि व्यवहार में बदलाव न आये तो उन्हें दण्ड दिया जाना आवश्यक है, किन्तु जान से मारना इसका समाधान नहीं है।
लेखक ने नाटक अत्यन्त सहज, सरल, रोजाना बोली जाने वाली राजस्थानी भाषा में लिखा है। नाटक इतना रोचक है कि बच्चे इस नाटक को मंच पर आसानी से खेल सकते हैं। बच्चे इसमें अभिनय करने, इसे देखने एवं पढऩे सभी में समान रूप से हर्षित होंगे। नाटक के सात दृश्य हैं। सातों में लेखक ने पात्रों के मनोभावों दर्शाने के लिए समयानुकूल उचित टिप्पणी (ब्रेकेट) में प्रदान की है ताकि अभिनय में आसानी रहे।
पुस्तक का आवरण विषय के मंतव्य को समझाने-दर्शाने में पूर्ण रूप से सक्षम है। पुस्तक का कागज, मुद्रण एवं साज-सज्जा सभी स्तरीय है। मैं इतने मनोरंजक बाल नाटक लिखने के लिए दीनदयाल शर्मा को हार्दिक बधाई देती हूं।
-सरला अग्रवाल,
आस्था, 5वीं 20 तलवण्डी,
कोटा-324005, राजस्थान
पुस्तक : शंखेसर रा सींग, लेखक : श्री दीनदयाल शर्मा, प्रकाशक : राजस्थान बाल कल्याण परिषद्, 10/22, आर.एच.बी., हनुमानगढ़ संगम (राज.), पृष्ठ : 40, मूल्य : 20 रुपये। बच्चों की प्रिय पत्रिका बालवाणी, अप्रैल, 1998, पेज संख्या-47 पर
Sunday, October 22, 2017
पापा का बाल मन, उनकी उम्र का मोहताज नहीं
पापा का बाल मन, उनकी उम्र का मोहताज नहीं
अपने सौभाग्य को केन्द्र में रखकर पापा के बारे में जब भी सोचता हूं, तो लाख परेशानी और चिंताओं के बीच भी चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान आ जाती है। ये मुस्कान पापा की उसी छवि को प्रस्तुत करती है, जो मैंने होश सम्भालते ही उनके लिए महसूस की है। भावुकता, अनुशासन, समयनिष्ठ, स्पष्टवादिता और बालमन की जीती-जागती तस्वीर हैं पापा। ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कि वे मेरे पिता हैं बल्कि ऐसा मैंने खुद महसूस किया है और प्रयासरत हूं कि मैं भी इनकी ये सभी विशेषताएं अंगीकार करूं। इन विशेषताओं में सर्वोपरि है उनका बाल मन। जो उनकी उम्र का मोहताज नहीं है। बच्चों को देखकर ऐसे खुश हो जाते हैं, जैसे सवेरे सवेरे बगिया में खिलते फूलों को देखकर माली।
इसके अलावा पापा की स्पष्टवादिता से भी मैं बहुत प्रभावित होता हूं। जो भी इनके दिल में होता है उसे स्पष्ट रूप से कह देते हैं। पापा हमेशा कहते हैं, बेटा मुझसे ये जोड़ घटाओ नहीं होता, जो बात है वह कह देता हूं। पापा की अनेक खूबसूरत कविताओं में से एक कविता इसी भाव को दर्शाती है कि- ‘कोयला जैसा बाहर से/ वैसा ही भीतर/ फिर भी/ दूसरों के लिए जलता है/ लेकिन आदमी का आजकल/ पता ही नहीं चलता है।’’
हम जानते हैं कि हमें जीने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। इसके बिना हम जिंदा नहीं रह पाएंगे। लेकिन बचपन से मैंने महसूस किया है कि ऑक्सीजन के अलावा एक और चीज भी है जो पापा के लिए बहुत जरूरी है। और वो है- साहित्य। साहित्य जगत में बाल साहित्य विधा में देशभर में पापा ने अपनी छाप छोड़ी है। लेकिन मेरी इच्छा है कि उनकी ये छाप विदेश तक भी जाए।
घर में रखी हजारों किताबों को देखकर मैं बचपन में अक्सर पापा से कह देता था कि ‘पापा इतनी किताबों का हम क्या करेंगे?’ तब पापा का बड़ा सुंदर जवाब आता कि ‘बेटा, पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र हैं, जो हमारा साथ कभी नहीं छोड़ती।’
मुझे आज भी याद है जब मैं लगभग 5-6 साल का था। पापा जगह-जगह पुस्तक प्रदर्शनी लगाया करते। प्रदर्शनी के लिए रखी ढेर सारी किताबों में से एक-आध किताब मैं भी उठाकर मेज पर रखवाता, ‘कम कीमत में कीमती किताबें’ स्लोगन वाले बैनर दीवारों पर सेलो टेप लगवाकर चिपकाने में सहायता करते हुए उनके इस अद्भुत मिशन में अपनी हाजिरी देने की कोशिश करता। वो बात अलग है कि मेरा ज्यादा ध्यान बगल वाली ‘बर्फ गोले’ की दुकान पर होता था।
सैकड़ों साहित्यिक सम्मेलनों में पापा मुझे अपने साथ ले जाते। आज भी ये अवसर मैं नहीं छोड़ता। उनके अनुभवों को मैंने भी महसूस किया है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि अपने बच्चे को हरदम साथ रखने वाला पिता स्वयं अपने व्यक्तिगत जीवन में भी अनुशासित रहता है और यही अनुशासन, बच्चे के भीतर संस्कारों को जन्म देता है।
पापा जो कुछ भी लिखते हैं, पहले उसे पढक़र घर में हम सभी को सुनाते हैं और उनकी हर कृति भीतर तक छू जाती है। ये सिलसिला शुरू से लेकर अब तक जारी है। साहित्य के इस माहौल ने बहुत कुछ सिखाया है। आज ये लिख पाना भी मेरे लिए इसीलिए संभव हुआ है, क्योंकि समय-समय पर मुझे साहित्यिक खुराक मिलती रही है।
पापा जो कुछ भी लिखते हैं या लिखा हुआ पढक़र सुनाते हैं, तो वे उसे भीतर तक महसूस भी करते हैं। कविता पाठ करते समय मंच पर कई बार इनका दिल भर आता है। गला भर जाता है। आंखें नम हो जाती हैं। जो कि इनकी भावुकता की पराकाष्ठा कह सकता हूं।
इसके अलावा और भी कई क्षण ऐसे हैं जब हम दोनों ही आपस में गले लगकर भावुक हो जाते हैं। सन् 2012 में भी ऐसा ही एक पल तब आया जब किसी राजकीय कार्य से पापा का जयपुर जाना हुआ और मैं भी बीकानेर अपने कॉलेज से सीधा जयपुर पहुंच गया, आकाशवाणी में कंपीयर के रूप में युववाणी प्रोग्राम के लिए। शिक्षक भवन में पापा से मिला। बातें करते-करते रात वहीं गुजरी। सवेरे-सवेरे जब चाय की चुस्की लेने पापा शिक्षक भवन से बाहर गए, तो अखबार की ताजा हेडलाइन देखकर दौड़े चले आए। कमरे का दरवाजा खोला और नींद से मुझे जगाते हुए उल्लास के साथ बोले कि ‘बेटा बधाई हो, मुझे राजस्थानी भाषा में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से पुरस्कार देने की घोषणा हुई है।’ सचमुच ये वो पल था, जिसका मैंने काफी समय से इंतजार किया था। हम दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया। दोनों की आंखें नम थी।
अपने मित्रों, रिश्तेदारों को जन्मदिवस या उनके जीवन के खास अवसरों पर सर्वप्रथमबधाई देने से भी पापा कभी नहीं चूकते। फिर चाहे उस बधाई का माध्यम टेलीफोन हो या फेसबुक।
पापा हमेशा से मेरे दोस्त बनकर रहे हैं। इसीलिए मुझे कभी बाहर दोस्त तलाशने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। उन्होंने हमेशा मुझे हौसला दिया है। मेरी हर इच्छा को इस सीख के साथ पूरा किया है, कि कुछ भी पाने के लिए मेहनत जरूरी है और पापा का एक खास डायलॉग जो अक्सर मुझसे कहते हैं, ‘बेटा जो मेरा है, वो तेरा है और जो तेरा है वो भी तेरा है। फिर मैं हंसकर उनसे कहता हूं, ‘तो पापा, फिर आपका क्या है?’’ पापा का जवाब होता है- ‘तुम ’
साहित्य के साथ-साथ पापा ने परिवार की हर जरूरत का भी बखूबी ख्याल रखा है। अपनी हर जिम्मेदारी को निभाया है। पापा ने मुझे कई दिन पहले अपने व्यक्तित्व और कृतित्व पर कुछ पंक्तियां लिखने को कहा था। असंख्य संस्मरण हैं लिखने को, लेकिन शब्द सीमा में बंधा होने के कारण मुझे यहीं विराम देना पड़ रहा है।
अंत में यही कि, पापा का मेरे और मेरा उनके प्रति जो स्नेह है, वो बयां कर पाना मेरे लिए नाममुकिन है। गर्व है मुझे मेरेे नसीब पर जिसमें ऐसे पिता मिले। इन पंक्तियों के साथ बस इतना लिखूंगा कि ये भावनाएं व्यक्त करने के विचार मात्र से ही मैं भीतर तक भर गया हूं। ‘तुम हो, तो मैं हूं............. तुम नहीं, तो कुछ भी नहीं।’
- दुष्यंत जोशी
पुत्र दीनदयाल शर्मा
मोबाइल: 9509471504
अपने सौभाग्य को केन्द्र में रखकर पापा के बारे में जब भी सोचता हूं, तो लाख परेशानी और चिंताओं के बीच भी चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान आ जाती है। ये मुस्कान पापा की उसी छवि को प्रस्तुत करती है, जो मैंने होश सम्भालते ही उनके लिए महसूस की है। भावुकता, अनुशासन, समयनिष्ठ, स्पष्टवादिता और बालमन की जीती-जागती तस्वीर हैं पापा। ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कि वे मेरे पिता हैं बल्कि ऐसा मैंने खुद महसूस किया है और प्रयासरत हूं कि मैं भी इनकी ये सभी विशेषताएं अंगीकार करूं। इन विशेषताओं में सर्वोपरि है उनका बाल मन। जो उनकी उम्र का मोहताज नहीं है। बच्चों को देखकर ऐसे खुश हो जाते हैं, जैसे सवेरे सवेरे बगिया में खिलते फूलों को देखकर माली।
इसके अलावा पापा की स्पष्टवादिता से भी मैं बहुत प्रभावित होता हूं। जो भी इनके दिल में होता है उसे स्पष्ट रूप से कह देते हैं। पापा हमेशा कहते हैं, बेटा मुझसे ये जोड़ घटाओ नहीं होता, जो बात है वह कह देता हूं। पापा की अनेक खूबसूरत कविताओं में से एक कविता इसी भाव को दर्शाती है कि- ‘कोयला जैसा बाहर से/ वैसा ही भीतर/ फिर भी/ दूसरों के लिए जलता है/ लेकिन आदमी का आजकल/ पता ही नहीं चलता है।’’
हम जानते हैं कि हमें जीने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। इसके बिना हम जिंदा नहीं रह पाएंगे। लेकिन बचपन से मैंने महसूस किया है कि ऑक्सीजन के अलावा एक और चीज भी है जो पापा के लिए बहुत जरूरी है। और वो है- साहित्य। साहित्य जगत में बाल साहित्य विधा में देशभर में पापा ने अपनी छाप छोड़ी है। लेकिन मेरी इच्छा है कि उनकी ये छाप विदेश तक भी जाए।
घर में रखी हजारों किताबों को देखकर मैं बचपन में अक्सर पापा से कह देता था कि ‘पापा इतनी किताबों का हम क्या करेंगे?’ तब पापा का बड़ा सुंदर जवाब आता कि ‘बेटा, पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र हैं, जो हमारा साथ कभी नहीं छोड़ती।’
मुझे आज भी याद है जब मैं लगभग 5-6 साल का था। पापा जगह-जगह पुस्तक प्रदर्शनी लगाया करते। प्रदर्शनी के लिए रखी ढेर सारी किताबों में से एक-आध किताब मैं भी उठाकर मेज पर रखवाता, ‘कम कीमत में कीमती किताबें’ स्लोगन वाले बैनर दीवारों पर सेलो टेप लगवाकर चिपकाने में सहायता करते हुए उनके इस अद्भुत मिशन में अपनी हाजिरी देने की कोशिश करता। वो बात अलग है कि मेरा ज्यादा ध्यान बगल वाली ‘बर्फ गोले’ की दुकान पर होता था।
सैकड़ों साहित्यिक सम्मेलनों में पापा मुझे अपने साथ ले जाते। आज भी ये अवसर मैं नहीं छोड़ता। उनके अनुभवों को मैंने भी महसूस किया है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि अपने बच्चे को हरदम साथ रखने वाला पिता स्वयं अपने व्यक्तिगत जीवन में भी अनुशासित रहता है और यही अनुशासन, बच्चे के भीतर संस्कारों को जन्म देता है।
पापा जो कुछ भी लिखते हैं, पहले उसे पढक़र घर में हम सभी को सुनाते हैं और उनकी हर कृति भीतर तक छू जाती है। ये सिलसिला शुरू से लेकर अब तक जारी है। साहित्य के इस माहौल ने बहुत कुछ सिखाया है। आज ये लिख पाना भी मेरे लिए इसीलिए संभव हुआ है, क्योंकि समय-समय पर मुझे साहित्यिक खुराक मिलती रही है।
पापा जो कुछ भी लिखते हैं या लिखा हुआ पढक़र सुनाते हैं, तो वे उसे भीतर तक महसूस भी करते हैं। कविता पाठ करते समय मंच पर कई बार इनका दिल भर आता है। गला भर जाता है। आंखें नम हो जाती हैं। जो कि इनकी भावुकता की पराकाष्ठा कह सकता हूं।
इसके अलावा और भी कई क्षण ऐसे हैं जब हम दोनों ही आपस में गले लगकर भावुक हो जाते हैं। सन् 2012 में भी ऐसा ही एक पल तब आया जब किसी राजकीय कार्य से पापा का जयपुर जाना हुआ और मैं भी बीकानेर अपने कॉलेज से सीधा जयपुर पहुंच गया, आकाशवाणी में कंपीयर के रूप में युववाणी प्रोग्राम के लिए। शिक्षक भवन में पापा से मिला। बातें करते-करते रात वहीं गुजरी। सवेरे-सवेरे जब चाय की चुस्की लेने पापा शिक्षक भवन से बाहर गए, तो अखबार की ताजा हेडलाइन देखकर दौड़े चले आए। कमरे का दरवाजा खोला और नींद से मुझे जगाते हुए उल्लास के साथ बोले कि ‘बेटा बधाई हो, मुझे राजस्थानी भाषा में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से पुरस्कार देने की घोषणा हुई है।’ सचमुच ये वो पल था, जिसका मैंने काफी समय से इंतजार किया था। हम दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया। दोनों की आंखें नम थी।
अपने मित्रों, रिश्तेदारों को जन्मदिवस या उनके जीवन के खास अवसरों पर सर्वप्रथमबधाई देने से भी पापा कभी नहीं चूकते। फिर चाहे उस बधाई का माध्यम टेलीफोन हो या फेसबुक।
पापा हमेशा से मेरे दोस्त बनकर रहे हैं। इसीलिए मुझे कभी बाहर दोस्त तलाशने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। उन्होंने हमेशा मुझे हौसला दिया है। मेरी हर इच्छा को इस सीख के साथ पूरा किया है, कि कुछ भी पाने के लिए मेहनत जरूरी है और पापा का एक खास डायलॉग जो अक्सर मुझसे कहते हैं, ‘बेटा जो मेरा है, वो तेरा है और जो तेरा है वो भी तेरा है। फिर मैं हंसकर उनसे कहता हूं, ‘तो पापा, फिर आपका क्या है?’’ पापा का जवाब होता है- ‘तुम ’
साहित्य के साथ-साथ पापा ने परिवार की हर जरूरत का भी बखूबी ख्याल रखा है। अपनी हर जिम्मेदारी को निभाया है। पापा ने मुझे कई दिन पहले अपने व्यक्तित्व और कृतित्व पर कुछ पंक्तियां लिखने को कहा था। असंख्य संस्मरण हैं लिखने को, लेकिन शब्द सीमा में बंधा होने के कारण मुझे यहीं विराम देना पड़ रहा है।
अंत में यही कि, पापा का मेरे और मेरा उनके प्रति जो स्नेह है, वो बयां कर पाना मेरे लिए नाममुकिन है। गर्व है मुझे मेरेे नसीब पर जिसमें ऐसे पिता मिले। इन पंक्तियों के साथ बस इतना लिखूंगा कि ये भावनाएं व्यक्त करने के विचार मात्र से ही मैं भीतर तक भर गया हूं। ‘तुम हो, तो मैं हूं............. तुम नहीं, तो कुछ भी नहीं।’
- दुष्यंत जोशी
पुत्र दीनदयाल शर्मा
मोबाइल: 9509471504
मेरे पिता भी आप, मेरी मां भी आप, मेरे दोस्त भी आप, मेरे गुरु भी आप
मेरे पिता भी आप, मेरी मां भी आप,
मेरे दोस्त भी आप, मेरे गुरु भी आप
शुरूआत कैसे करूं...समझ नहीं आता। पापा के बारे में जितना भी लिखूं उतना कम है। शुरू से ही मैं पापा की और पापा मेरे चहेते रहे हैं। कहते हैं ना बेटियां अपने पापा की लाडली होती हैं और मैं पापा की सबसे लाडली रही हूं। हर बेटी चाहती है कि वो अपनी मां जैसी बने लेकिन मैं पापा जैसी बनना चाहती हूं। और जब लोग कहते है कि तूं बिल्कुल अपने पापा जैसी है तो सच कहूं वो पल मेरे लिए बहुत ही खास होता है।
पापा ने न सिर्फ बोलना, चलना, पढऩा लिखना सिखाया है बल्कि अपनी खूबियां भी हमें भेंट के रूप में दी हैं। आज जो कुछ भी लिख पा रही हूं, सब पापा की ही देन है। मेरी हैंड राइटिंग, तर्क शक्ति, नये विचार से सब पापा को देखकर उन चीजों को महसूस करके सीखा है। मम्मी से ज्यादा जुड़ाव मेरा पापा के साथ रहा है। इसी कारण अपनी हर बात, हर जरूरत, हर परेशानी में मैंने पापा से बांटी है और पापा ने हमेशा मेरा साथ दिया है।
वर्ष 2006 में दादा जी के देहावसान के बाद जब एक दिन पापा अकेले कमरे में बैठे थे तब बातों ही बातों में पापा ने पूछा कि बेटा तुम सबसे ज्यादा प्यार किसे करती हो? सुनते ही झट से बोल पड़ी-पापा, दादाजी से करती थी, लेकिन उनके बाद आपसे करती हंू। पापा ने फिर पूछा-बेटा, मुझसे कितना प्यार करती हो? तो मैंने अपने हाथों फैलाया, जितना दूर तक ले जा सकती थी, कहा-इतना प्यार करती हूं मैं आपसे। यह देखकर पापा ने मुझे बांहों में भर लिया।
पापा जब अपने साहित्य सम्मेलन के लिए कहीं बाहर चले जाते हैं तो उनके बिना घर खाली-खाली सा लगता है। मानो दिन कटना मुश्किल हो जाता है। प्यार के साथ डाँट फटकार भी जरूरी है, जो समय-समय पर मुझे मिलती रहती है। जो बहुत अच्छी लगती है। पापा-बेटी की नोकझोंक में हम रूठ भी जाएं तो दोस्त की तरह एक दूसरे को मना भी लेते हैं।
पापा ने साहित्य को हमेशा अपना हिस्सा माना है। मानो साहित्य उनके शरीर का एक अंग ही हो। पापा हमारे साथ कहीं घूमने जाएं तो साहित्य हमेशा उनके साथ ही रहता है। बातों-बातों में ही नई कविता बना लेना। कुछ नया विचार आते ही उस पर कहानी लिख देना उनकी आदत में शामिल है। यात्रा के दौरान उनकी कविताओं से रास्ते में चार चाँद लग जाते हैं।
जब मेरी किसी सहेली का जन्मदिन आता है तो पापा से पूछती हूं कि क्या तोहफा दूं ? तो पापा की हमेशा यही राय होती है कि कोई किताब दे दो। पहले तो मैं यह सुनकर मुँह बना लेती कि पापा ने यह क्या कह दिया, लेकिन जैसे-जैसे समझ आने लगी तब से किताबों के महत्त्व की जानकारी हुई।
मेरी लेखन में रुचि होने का श्रेय सिर्फ पापा को ही जाता है। मेरी लिखी कहानियां पापा के मार्गदर्शन के बिना अधूरी सी लगती है। पापा के बहुत से गुण हमें उनसे आंशिक रूप से मिले हैं। उन्होंने हम तीनों बच्चों को हमेशा प्रेरित किया है और हर काम में हमारा साथ दिया है। पापा मेरे लिए क्या मायने रखते हैं बता पाना मेरे लिए उतना ही मुश्किल है जितना कि बाहुबली-2 आने से पहले बता पाना कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा था। लेकिन इन छोटी-छोटी चार पंक्तियों में मैं बताना चाहूंगी कि- मेरे पिता भी आप
मेरी मां भी आप
मेरे दोस्त भी आप
मेरे गुरु भी आप।
पापा एक अच्छे साहित्यकार होने के साथ-साथ अपने जीवन में एक अच्छे व्यक्ति भी हैं। बच्चों के प्रति प्रेम, युवा पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिला कर चलने की कोशिश करते हैं। बड़े होने के बावजूद भी पापा ने कभी अपने आप पर अभिमान नहीं किया और जो कुछ बच्चे उन्हें बताते हैं वे बहुत ही धीरज और प्रेम से सुनते हैं और उसे अपनाते भी हैं यानी बच्चों की हर बात को वे पूरी तवज्जो देते हैं।
पापा का ये मानना है कि छोटा हो या बड़ा सब के पास अलग-अलग तरह का ज्ञान है और हर किसी से कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है।
पापा की कही एक - एक बात हमेशा याद रहती है कि उम्र से बड़े होना, दिल से नहीं। अपने दिल में जो छिपा बचपन है उसे कभी खत्म नहीं होने देना। शायद यही वजह है कि मैं आज भी बर्ताव करती हूं और हर छोटी से छोटी बातों को पापा की कही-समझाई बातें याद आ जाती हैं। मेरे पापा मेरी जिन्दगी में मेरे लिए मेरे आदर्श हैं और मैं उनकी परछाई बनने की करूंगी।
-मानसी शर्मा
प्रथम वर्ष, कला वर्ग,
रेयान कॉलेज, हनुमानगढ़
पुत्री श्री दीनदयाल शर्मा

मेरे दोस्त भी आप, मेरे गुरु भी आप
शुरूआत कैसे करूं...समझ नहीं आता। पापा के बारे में जितना भी लिखूं उतना कम है। शुरू से ही मैं पापा की और पापा मेरे चहेते रहे हैं। कहते हैं ना बेटियां अपने पापा की लाडली होती हैं और मैं पापा की सबसे लाडली रही हूं। हर बेटी चाहती है कि वो अपनी मां जैसी बने लेकिन मैं पापा जैसी बनना चाहती हूं। और जब लोग कहते है कि तूं बिल्कुल अपने पापा जैसी है तो सच कहूं वो पल मेरे लिए बहुत ही खास होता है।
पापा ने न सिर्फ बोलना, चलना, पढऩा लिखना सिखाया है बल्कि अपनी खूबियां भी हमें भेंट के रूप में दी हैं। आज जो कुछ भी लिख पा रही हूं, सब पापा की ही देन है। मेरी हैंड राइटिंग, तर्क शक्ति, नये विचार से सब पापा को देखकर उन चीजों को महसूस करके सीखा है। मम्मी से ज्यादा जुड़ाव मेरा पापा के साथ रहा है। इसी कारण अपनी हर बात, हर जरूरत, हर परेशानी में मैंने पापा से बांटी है और पापा ने हमेशा मेरा साथ दिया है।
वर्ष 2006 में दादा जी के देहावसान के बाद जब एक दिन पापा अकेले कमरे में बैठे थे तब बातों ही बातों में पापा ने पूछा कि बेटा तुम सबसे ज्यादा प्यार किसे करती हो? सुनते ही झट से बोल पड़ी-पापा, दादाजी से करती थी, लेकिन उनके बाद आपसे करती हंू। पापा ने फिर पूछा-बेटा, मुझसे कितना प्यार करती हो? तो मैंने अपने हाथों फैलाया, जितना दूर तक ले जा सकती थी, कहा-इतना प्यार करती हूं मैं आपसे। यह देखकर पापा ने मुझे बांहों में भर लिया।
पापा जब अपने साहित्य सम्मेलन के लिए कहीं बाहर चले जाते हैं तो उनके बिना घर खाली-खाली सा लगता है। मानो दिन कटना मुश्किल हो जाता है। प्यार के साथ डाँट फटकार भी जरूरी है, जो समय-समय पर मुझे मिलती रहती है। जो बहुत अच्छी लगती है। पापा-बेटी की नोकझोंक में हम रूठ भी जाएं तो दोस्त की तरह एक दूसरे को मना भी लेते हैं।
पापा ने साहित्य को हमेशा अपना हिस्सा माना है। मानो साहित्य उनके शरीर का एक अंग ही हो। पापा हमारे साथ कहीं घूमने जाएं तो साहित्य हमेशा उनके साथ ही रहता है। बातों-बातों में ही नई कविता बना लेना। कुछ नया विचार आते ही उस पर कहानी लिख देना उनकी आदत में शामिल है। यात्रा के दौरान उनकी कविताओं से रास्ते में चार चाँद लग जाते हैं।
जब मेरी किसी सहेली का जन्मदिन आता है तो पापा से पूछती हूं कि क्या तोहफा दूं ? तो पापा की हमेशा यही राय होती है कि कोई किताब दे दो। पहले तो मैं यह सुनकर मुँह बना लेती कि पापा ने यह क्या कह दिया, लेकिन जैसे-जैसे समझ आने लगी तब से किताबों के महत्त्व की जानकारी हुई।
मेरी लेखन में रुचि होने का श्रेय सिर्फ पापा को ही जाता है। मेरी लिखी कहानियां पापा के मार्गदर्शन के बिना अधूरी सी लगती है। पापा के बहुत से गुण हमें उनसे आंशिक रूप से मिले हैं। उन्होंने हम तीनों बच्चों को हमेशा प्रेरित किया है और हर काम में हमारा साथ दिया है। पापा मेरे लिए क्या मायने रखते हैं बता पाना मेरे लिए उतना ही मुश्किल है जितना कि बाहुबली-2 आने से पहले बता पाना कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा था। लेकिन इन छोटी-छोटी चार पंक्तियों में मैं बताना चाहूंगी कि- मेरे पिता भी आप
मेरी मां भी आप
मेरे दोस्त भी आप
मेरे गुरु भी आप।
पापा एक अच्छे साहित्यकार होने के साथ-साथ अपने जीवन में एक अच्छे व्यक्ति भी हैं। बच्चों के प्रति प्रेम, युवा पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिला कर चलने की कोशिश करते हैं। बड़े होने के बावजूद भी पापा ने कभी अपने आप पर अभिमान नहीं किया और जो कुछ बच्चे उन्हें बताते हैं वे बहुत ही धीरज और प्रेम से सुनते हैं और उसे अपनाते भी हैं यानी बच्चों की हर बात को वे पूरी तवज्जो देते हैं।
पापा का ये मानना है कि छोटा हो या बड़ा सब के पास अलग-अलग तरह का ज्ञान है और हर किसी से कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है।
पापा की कही एक - एक बात हमेशा याद रहती है कि उम्र से बड़े होना, दिल से नहीं। अपने दिल में जो छिपा बचपन है उसे कभी खत्म नहीं होने देना। शायद यही वजह है कि मैं आज भी बर्ताव करती हूं और हर छोटी से छोटी बातों को पापा की कही-समझाई बातें याद आ जाती हैं। मेरे पापा मेरी जिन्दगी में मेरे लिए मेरे आदर्श हैं और मैं उनकी परछाई बनने की करूंगी।
-मानसी शर्मा
प्रथम वर्ष, कला वर्ग,
रेयान कॉलेज, हनुमानगढ़
पुत्री श्री दीनदयाल शर्मा

रंग रे दीनदयाल
रंग रे दीनदयाल
गढ हनुमाना में बसै, चावौ दीनदयाल।
भटनेरी इतिहास भट्ट, लाडक मां रौ लाल।।
'टाबर टोळी' सुप्रसिद्ध काढै छै अखबार।
सुधरै पीढी सांतरी, थळकण मुळकै थार।।
साहित री ले सीरणी, शर्मा दीनदयाल।
भावी पीढी रौ भविस, दमकै सूरज लाल।।
गीत, कविता अर कथा, टाबर मुळकण देत।
शर्मा दीनदयाल सा, हिंवड़ै राखै हेत।।
'टाबर टोळी' रंग में, आखर प्रीत अपार।
शर्मा दीनदयाल नित, सींचै कण-कण थार।।
कारटून अर बाळकथा, विध-विध रा समंचार।
'टाबर टोळी' नित नवी, रंग भटनेरी थार।।
म्हारौ व्हालौ मिंत औ रंग रे दीनदयाल।
साजौ राखै सुरसती, मां जगदम्ब रुखाळ।।
-डॉ.आईदानसिंह भाटी,
8-बी / 47 तिरुपतिनगर,
नांदड़ी, जोधपुर, राज.
गढ हनुमाना में बसै, चावौ दीनदयाल।
भटनेरी इतिहास भट्ट, लाडक मां रौ लाल।।
'टाबर टोळी' सुप्रसिद्ध काढै छै अखबार।
सुधरै पीढी सांतरी, थळकण मुळकै थार।।
साहित री ले सीरणी, शर्मा दीनदयाल।
भावी पीढी रौ भविस, दमकै सूरज लाल।।
गीत, कविता अर कथा, टाबर मुळकण देत।
शर्मा दीनदयाल सा, हिंवड़ै राखै हेत।।
'टाबर टोळी' रंग में, आखर प्रीत अपार।
शर्मा दीनदयाल नित, सींचै कण-कण थार।।
कारटून अर बाळकथा, विध-विध रा समंचार।
'टाबर टोळी' नित नवी, रंग भटनेरी थार।।
म्हारौ व्हालौ मिंत औ रंग रे दीनदयाल।
साजौ राखै सुरसती, मां जगदम्ब रुखाळ।।
-डॉ.आईदानसिंह भाटी,
8-बी / 47 तिरुपतिनगर,
नांदड़ी, जोधपुर, राज.
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